हमारा भारत देश एक कृषि प्रधान देश है, जहां ज्यादातर लोगो का जीवन कृषि पर निर्भर करता है। आज के समय में और बढ़ती आबादी के साथ, पारंपरिक खेती की तकनीके अब पर्यावरण और किसानों दोनों के लिए चुनौती बनती जा रही हैं। ऐसे में, सतत कृषि (Sustainable Agriculture) एक समाधान के रूप में दिखाई दे रही है, जो न केवल पर्यावरण की रक्षा करती है, बल्कि किसानों की आय और समाज को भी बेहतर बनाती है।

सतत कृषि क्या है ?
सतत कृषि (Sustainable Agriculture), कृषि की एक ऐसी प्रणाली है जिससे आज के खाद्य की जरूरत को ध्यान में रखते हुए खेती की जाती है एवं भविष्य की पीढ़ियों की कृषि जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाता है।
वर्तमान समय में जहाँ भारत की जनसंख्या 2025 में 1.46 अरब होने का अनुमान है, वही दूसरी तरफ खेती पर उत्पादकता बढ़ाने का दवाब लगातर बढ़ता जा रहा है। इसी मांग को पूरा करने के लिए लगातर कृषि में प्राकृतिक संसांधनों जैसे मिट्टी, जल, पौधों, पशुओं का अत्यधिक प्रयोग किया जा रहा है। इस प्राकृतिक संसाधनों पर ज्यादा निर्भरता के कारण कई समस्याए उभर कर आ रही है जैसे मिट्टी की उर्वरता में कमी, जल संकट, रासायनिक खादों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, और पर्यावरणीय असंतुलन। ऐसे में सतत कृषि की आवश्यकता बढ़ती हुई दिखाई दे रही है जिससे न केवल आज की जरूरतों को पूरा किया जा सके बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाध्नों को बचाया जा सके।
सतत कृषि के मानक (Principles of Sustainable Agriculture)
सतत कृषि को अपनाने के लिए सबसे पहले हमें उसके सिद्धांतो से परिचित होना अति आवश्यक है, सतत कृषि (Sustainable Agriculture) के कुछ मुख्य मानक इस प्रकार है :
- मिटटी की उर्वरता बनाए रखना: मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना खेती की सफलता और टिकाऊ उत्पादन के लिए अत्यंत आवश्यक है। अगर मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाए, तो फसलो में पोषक तत्वों में कमी और उत्पादन अधिक नहीं हो पाता है।
- प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता को कम करना: जिस तरह अंधाधुन कृषि के लिए आज प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग किया जा रहा उसके लिए जरूरी है की हम जल, मिट्टी, जैव विविधता आदि का संतुलित उपयोग करे।
- किसानो को आर्थिक सुरक्षा: इसके द्वारा किसानो की आय में वृद्धि के साथ साथ पर्यावरण को भी बचाया जा सकता है।
- रासायनिक खादों और कीटनाशकों का न्यूनतम प्रयोग: इस कृषि में किसानो को रासायनिक खादों एवं कीटनाशको का खेती के दौरान कम प्रयोग करने पर जोर दिया जाता है।
सतत कृषि के लाभ:
इस खेती से न केवल किसानो को लाभ होगा बल्कि पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचा सकेंगे। बाकि अन्य देशो में इसी कृषि द्वारा खेती की जाती है। सतत कृषि के कई लाभ है, जो इस प्रकार है :
- पर्यावरण संरक्षण में सहायक कृषि प्रणाली है।
- किसानो की आय में वृद्धि करती है।
- मिटटी की उर्वरकता को न केवल बनाये रखता हैं बल्कि उसे बढ़ोतरी भी करता है।
- जल संरक्षण में सहायक है ।
- स्वास्थ्य के लिए लाभकारी, क्योकि इससे फसलों में लम्बे समय के लिए पोषक तत्व बने रहते है।
- मिटटी में लाभकारी सुक्ष्म जीवों की पर्याप्त संख्या को बनाये रखता है।
सतत कृषि के तरीके
सतत कृषि को करने के लिए कई तरीके है जिससे किसान अपनी खेती में इसे पूरी तरह से अपनी सुविधा के अनुसार प्रयोग में ला सकते है, यह तरीके कुछ इस प्रकार है :
- फसल चक्र (Crop Rotation): हर साल किसान को अलग-अलग फसलें बोने से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और कीट-रोग भी खेतो में कम होते हैं।
- मिश्रित खेती (Mixed Farming): किसान को एक ही खेत में कई प्रकार की फसलें या पशुपालन करना चाहिए, जिससे जोखिम कम होता है और आय के स्रोत बढ़ते हैं।
- जैविक खेती (Organic Farming): रासायनिक खादों की जगह गोबर, कम्पोस्ट, हरी खाद, वर्मी कम्पोस्ट आदि का प्रयोग।
- प्राकृतिक खेती (Natural Farming): कृषि में किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थों का प्रयोग न करना, सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहना।
- एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM): प्राकृतिक शत्रुओं, जैविक कीटनाशकों, और फसल चक्र का उपयोग कर कीट नियंत्रण करना।
- जल संरक्षण तकनीकें: ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, वर्षा जल संचयन, खेत में मेड़बंदी आदि।
सतत कृषि अपनाने की चुनौतियाँ:
- किसानों में जागरूकता की कमी
- प्रारंभिक लागत अधिक होना
- जैविक उत्पादों के लिए बाजार की कमी
- सरकारी योजनाओं की जानकारी का अभाव
- तकनीकी ज्ञान की कमी
भारत में इसकी स्थिति (Sustainable Agriculture in India)
हमारे देश में इस खेती को सरकार द्वारा काफी बढ़ावा दिया जा रहा है, और कुछ राज्य है जो इस खेती को अपना भी चुके है जैसे सिक्किम, मध्य-प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल और बाकि राज्यों में भी सतत कृषि को राज्य सरकार प्रोत्साहित कर रही है। और सिक्किम तो देश का पहला पूर्ण जैविक राज्य बन चुका है।

केंद्र सरकार द्वारा परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) और राष्ट्रीय जैविक खेती मिशन (NMSA) जैसी योजनाएं भी चलाई जा रही हैं।
निष्कर्ष :
सतत कृषि न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए लाभकारी है। इससे मिट्टी, जल, और जैव विविधता का संरक्षण होता है, किसानों की आय बढ़ती है, और समाज को सुरक्षित और पोषक आहार मिलता है। यदि हम सब मिलकर सतत कृषि को अपनाएँ, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी खुशहाल और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं।
सतत कृषि और पारंपरिक कृषि में क्या अंतर है?
सतत कृषि पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों के सतत उपयोग पर बल देती है, जबकि पारंपरिक कृषि में अक्सर रासायनिक खाद और अधिक जल का उपयोग होता है।
क्या सतत कृषि से लाभ होता है?
हां, यह न केवल पर्यावरण को सुरक्षित रखती है बल्कि किसानों की लागत भी घटाती है और आय बढ़ाती है।
क्या सरकार सतत कृषि को बढ़ावा दे रही है?
हां, भारत सरकार ने कई योजनाएं लागू की हैं जैसे PKVY और NMSA।
टिकाऊ कृषि से आप क्या समझते हैं?
टिकाऊ कृषि, जिसे सतत कृषि भी कहा जाता है, एक ऐसी कृषि प्रणाली है जो पर्यावरण, आर्थिक और सामाजिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों को पूरा करने का प्रयास करती है।
कृषि के दो प्रकार क्या हैं?
आज, कृषि के दो विभाग हैं, निर्वाह और वाणिज्यिक, जो मोटे तौर पर कम विकसित और अधिक विकसित क्षेत्रों के अनुरूप हैं।
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